लघु उद्योग भारती और दिल्ली की अन्य सहयोगी औद्योगिक संगठनों के साथ दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के सामने दिल्ली के उद्यमियों के प्रति दिल्ली सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियों का सच बताया गया।
छोटे उद्योगों के प्रति दिल्ली सरकार के उपेक्षा पूर्ण व्यवहार से दिल्ली के उद्यमियों में रोष।
दिल्ली के राजस्व और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दिल्ली के छोटे उद्यमियों के प्रतिनिधियों ने आज अपने साथ दिल्ली सरकार के उपेक्षापूर्ण और प्रताड़ित करने वाले व्यवहार के विरुद्ध रोष प्रकट करने के लिए दिल्ली के प्रैस क्लब में एक प्रैस कॉन्फ्रेंस की।
उपस्थित उद्योग प्रतिनिधि इस बात से बेहद आक्रोशित थे कि आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव में राजनैतिक पार्टियों के चुनाव घोषणापत्रों/संकल्प पत्रों में भी उद्यमियों के मुद्दों को स्थान नही दिया गया है।
दिल्ली में देश में सबसे महंगी औद्योगिक बिजली के लिए वर्तमान दिल्ली सरकार को दोषी ठहराते हुए उद्योग प्रतिनिधियों ने बताया कि दिल्ली में औद्योगिक बिजली के दाम पिछले 10 वर्षों में दोगुने हो गए हैं। बिजली की मूल कीमत के ऊपर मनमाने ढंग से अपारदर्शी ढंग से सरचार्ज लगाए गए हैं। सरकारी कर्मचारियों को पेंशन देने का बोझ भी बिजली उपभोक्ताओं पर डाल दिया गया है।
इस प्रकार के मनमाने सरचार्जों के कारण दिल्ली की औद्योगिक बिजली पड़ौसी राज्यों की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है। जिसके कारण दिल्ली के छोटे उद्यमी व्यापारिक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाने की आशंका के कारण या तो दिल्ली से पलायन कर रहे हैं, या बन्द हो रहे हैं।
दिल्ली सरकार के अपने आंकड़े ये स्पष्ट कर रहे हैं कि 2011 -12 की अपेक्षा 2023 -24 में दिल्ली की GDP में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान 33% कम हो गया है।
दिल्ली सरकार की प्राथमिकता में दिल्ली की अर्थव्यवस्था में 90% और रोजगार सृजन में 35% डायरेक्ट योगदान देने वाले उद्योग कहीं नही हैं, ये इस सच से स्पष्ट हो रहा है कि वित्तीय वर्ष 2023 -24 में दिल्ली सरकार ने दिल्ली सरकार के राजस्व में 61000 करोड़ रुपये का योगदान देने वाले इंडस्ट्रियल सेक्टर पर मात्र 110 करोड़ खर्च किये, जबकि दिल्ली की जेलों पर 129 करोड़ रुपये खर्च किये गए।
दिल्ली के औद्योगिक भूखण्डों को लीज होल्ड से फ्रीहोल्ड करने के लिए तत्कालीन दिल्ली सरकार द्वारा 2005 में लाई गई पॉलिसी अभी तक क्रियान्वित नही हो पाई है। उद्यमियों द्वारा पूरा भुगतान कर दिए जाने के बावजूद उनको फ्रीहोल्ड अधिकार देने की बजाय उनको कोर्ट केसों में उलझा दिया गया है। रिलोकेशन स्कीम 1996 के 52000 से अधिक उद्यमियों को 2005 की फ्रीहोल्ड पॉलिसी में अभी तक सम्मिलित ही नही किया गया है।
उद्यमियों को अपनी भूमि का मालिकाना अधिकार ना मिलना दिल्ली के औद्योगिक विकास को रोक रहा है। सरकार से बार बार निवेदन के बावजूद उद्यमियों की समस्या का समाधान नही हो रहा है।
दिल्ली जल बोर्ड दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों में पर्याप्त पानी तो उपलब्ध नही करा पा रहा है, परन्तु पानी के कनेक्शन के नाम पर मोटे बिल अवश्य भेज रहा है। दिल्ली का छोटा उद्यमी पानी की कमी से जूझ रहा है।
MSME को पानी की कमी से राहत देने के लिये भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय द्वारा MSME को 10000KLD भूजल के दोहन की सुविधा दिल्ली सरकार ने अभी तक लागू नही की है, जिससे दिल्ली के उद्यमी अकारण प्रताड़ना सहन करने के लिये बाध्य हैं।
आज जब पिछले 10 वर्षों में देश की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, दिल्ली में ये रैंकिंग निरन्तर गिर रही है।
इसका कारण दिल्ली में अनेकों प्रकार के अवांछित लाइसेंस और लाइसेंस/अनुमति लेने की प्रकिया का पारदर्शी ना होना है।
उत्तरप्रदेश जैसा अपेक्षाकृत पिछड़ा राज्य इसके लिए आवश्यक 187 में से 186 मानदण्ड पूर्ण करके ईज ऑफ डूइंग में उच्च स्थान पर आ चुका है, जबकि दिल्ली सरकार इस दिशा में उदासीन बनी हुई है।
औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर के संरक्षण/विकास दिल्ली सरकार के एजेंडे में ही नही है। दिल्ली द्वारा उद्यमियों से लीज रेंट, प्रोपर्टी टैक्स और मेंटेनेन्स चार्ज के नाम पर बडी राशि वसूलने के बाद भी दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्र मूल भूत सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं, औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर मिलना तो दूर की बात है।
उद्योगों के प्रति दिल्ली सरकार की मानसिकता को समझने के लिए आनन्द पर्वत से टीकरी बॉर्डर तक के रोहतक रोड की स्तिथि को साक्षात देखा जा सकता है। दिल्ली के दर्जनों औद्योगिक क्षेत्रों -अधिसूचित औद्योगिक क्षेत्रों के बीच से गुजरती ये सड़क पिछले अनेक वर्षों से बदहाल है, लम्बे ट्रैफिक जाम का कारण बन रही है, फिर भी दिल्ली सरकार स्तिथि को सुधारने के लिए कुछ नही कर रही है।
ये केवल 1 उदाहरण है। पूरी दिल्ली के औद्योगिक -व्यापारिक क्षेत्रों में यही स्तिथि है।
दिल्ली की सड़कों की खराब स्तिथि, अतिक्रमण के कारण बढ़ते प्रदूषण का खामियाजा भी GRAP के रूप में दिल्ली के उद्यमियों को ही भुगतना पड़ता है। GRAP के समय औद्योगिक -व्यापारिक गतिविधियां ठप्प हो जाती हैं, कंस्ट्रक्शन गतिविधियों पर रोक भी पूरे इंडस्ट्रियल सेक्टर को प्रभावित करती है।
उद्योग प्रतिनिधियों ने 1 स्वर में दिल्ली में 1 ऐसी सरकार लाने का आह्वान किया, जो दिल्ली के उद्यमियों की पीड़ा को समझकर दिल्ली में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियां बनाकर उन्हें क्रियान्वित करे, बिजली के अतार्किक रूप से महंगे बिलों से राहत दिलाये और औद्योगिक क्षेत्रों सहित पूरी दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ बनाकर बढ़ते प्रदूषण से दिल्ली को राहत दिलाये।

