ओखला में MSME डिवेलपमेंट एंड फेसिलिटेशन दफ्तर में आयोजित क्लस्टर लेक्ल वर्कशॉप में मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और उद्यमी संस्थाओं के प्रतिनिधियों के बीच कई विषयों पर विस्तार से संवाद हुआ। सोमवार को हुई मीटिंग में MSME सचिव SCL, दास, डिप्टी डायरेक्टर आरके भारती, असिस्टेंट डायरेक्टर DS तोमर समेत अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे।
लघु उद्योग भारती से अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य वीरेंद्र नागपाल ने बताया कि संवाद के दौरान भारत में 'MSME की लागत और प्रतिस्पर्धात्मकता' पर भी चर्चा हुई। सरकार 'मेक इन इंडिया' की बात करती है, मगर जब उत्पादन लागत आयात की तुलना में ज्यादा हो, तो उद्यमी वैश्विक प्रतिस्पर्धा कैसे करे? रोजाना कच्चे माल की कीमतें बदलती हैं। फ्रेट चार्ज हर हफ्ते बढ़ते हैं। जो MSME थोड़ी मात्रा में स्टील या एल्यूमीनियम खरीदता है, उसे बड़ीकंपनियों से 15-20 प्रतिशत ज्यादा कीमत देनी पड़ती है। छोटे निर्माताओं के पास न तो बल्क डिस्काउंट होता है, न ही मोलभाव की ताकत। फिर भी उम्मीद की जाती है कि वैश्विक कीमतों का मुकाबला करें।
वरेिंद्र ने बताया कि वित्तीय खर्च 10 से 13 प्रतिशत हमारी प्रतिस्पर्धा को मार देता है, जबकि विदेशी प्रतिस्पर्धी 2-3 प्रतिशत पर लोन लेते हैं। देसी निर्माता सिर्फ उत्पाद नहीं, मेहनत भी निर्यात करते हैं। मीटिंग में लघु उद्योग भारती दिल्ली के अध्यक्ष दीवान चंद गुप्ता, नारायणा से रमेश सचदेवा, बादली से रवि सूद समेत अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों की संस्थाओं के पदाधिकारियों ने निम्नलिखित विषयों पर अपनी बात रखीं।
वर्कशॉप में इन समस्याओं पर चर्चा :
1. देरी और कागजी कार्यवाही : उद्यमी बाजारों से ज्यादा फाइलों से लड़ाई में ऊर्जा गंवाते हैं। हर अनुमति, हर मंजूरी, अलग विभाग, अलग नियम, अलग व्याख्या है। क्लेरिकल गलती से कंटेनर बंदरगाह पर हफ्तेभर रुकता है, तो उसका खर्च उद्यमी झेलते हैं।
2. वित्त की लड़ाई : बैंक उद्यमियों को बोझ की तरह देखते हैं। जमानत की मांग, अंतहीन कागजी प्रक्रिया और मनमाने जोखिम रेटिंग सिस्टम इनसे ऋण प्राप्त करना डरावना अनुभव है।
3. श्रम और कौशल : प्रशिक्षित लोगों की कमी है। उद्यमियों के खचें और जोखिम पर मजदूर का कौशल विकास फैक्ट्री में होता है। जैसे ही मजदूर प्रशिक्षित होता है, वो बड़ी कंपनी में चला जा में चला जाता है। श्रम कानून फैक्ट्री मालिकों को बांध देते हैं।
4. तकनीक, मानकों की लड़ाई : वैश्विक खरीदार सस्ते उत्पाद नहीं, प्रमाणित र उत्पाद चाहते हैं। UL, CE, EN, BIS हर सर्टिफिकेट लाखों का खर्च और भारी कागजी प्रक्रिया लेकर आता है। छोटे उद्यमी तकनीक अपनाने को तैयार है, लेकिन सुलभ टेस्टिंग लैव्स कहां हैं? आसान वित्तीय सहायता कहां है?
5. वैश्विक प्रतिस्पर्धा की लड़ाई : देसी उद्यमियों के असली प्रतिद्वंद्वी पड़ोस की फैक्ट्री नहीं, वो विदेशी वियतनाम, पोलैंड या बांग्लादेश की फैक्ट्री है, जो आधी लागत में उत्पादन कर रही है। हमें भी समान अवसर मिलेगा, तो अच्छा प्रोडक्शन होगा।